भगवान मेरी क्यों नहीं सुनते? प्रार्थना पूरी न हो तो क्या समझें
· 7 मिनटRead in English

संक्षेप में उत्तर
एकांतिक वार्तालाप में पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि भगवान मंगल भवन हैं — जो प्रार्थना पूरी होने से हमारा अमंगल होता, उसे वे पूरी नहीं करते। इसलिए प्रार्थना का पूरा न होना भी उनकी कृपा है। उपाय यह है: सुख और दुःख दोनों में भगवान से जुड़े रहिए, माँगना हो तो केवल उन्हीं से माँगिए, और हर प्रार्थना के साथ कहिए — 'आपको उचित न लगे तो पूरी मत करना।' इससे श्रद्धा कभी नहीं डगमगाएगी।
हाथ जोड़कर रोज़ प्रार्थना की, शाम को दीपक जलाया, कभी-कभी ठाकुर जी के सामने आँसू भी बहे — फिर भी नौकरी नहीं लगी, बीमारी नहीं गई, घर की परेशानी वहीं की वहीं रही। धीरे-धीरे मन में एक दर्द भरी बात उठने लगती है: "शायद भगवान मेरी सुनते ही नहीं। शायद मैं उनके लायक नहीं।"
अगर आपके मन में भी यह बात आती है, तो घबराइए नहीं। एकांतिक वार्तालाप में बहुत से लोग यही प्रश्न लेकर आते हैं, और महाराज जी के उत्तर बड़े कोमल और मन को हल्का करने वाले हैं। वे यह नहीं कहते कि और ज़ोर से प्रार्थना करो — वे प्रार्थना को देखने का नज़रिया बदल देते हैं।
क्या भगवान प्रार्थना सुनते हैं, या सब कर्मों से ही होता है?
एक बहन ने पूछा — "बचपन में मैंने प्रार्थना की थी कि मेरी इच्छाएँ पूरी हों। अगर सब कर्मों के हिसाब से ही मिलता है, तो प्रार्थना कब काम आती है?" एकांतिक वार्तालाप में महाराज जी समझाते हैं कि प्रार्थना और भजन भाग्य से अलग चीज़ हैं। भाग्य में जो लिखा है, वह तो मिलेगा ही; पर जब हम प्रार्थना करते हैं, तो भगवान हमारे कर्म न देखकर अपनी कृपा से देते हैं 27:34।
वे एक सीधा उदाहरण देते हैं। एक मज़दूर की दिन भर की मज़दूरी तय है — कुछ सौ रुपये। शाम को वह मालिक से कहता है, "बाबूजी, मेरी पत्नी को बड़ी परेशानी है," और मालिक उसे कहीं ज़्यादा रुपये दे देता है। वह पैसा उसकी मेहनत का नहीं, उसकी प्रार्थना का था। ऐसे ही प्रार्थना से जो काम बनता है, वह भाग्य नहीं — भगवान की कृपा है 27:34।
तो भगवान सुनते हैं। असली प्रश्न यह है कि जब उत्तर हमारी इच्छा जैसा न हो, तब हम क्या समझें।
प्रार्थना पूरी न हो तो क्या समझना चाहिए?
यहीं सत्संग की सबसे बड़ी बात है। महाराज जी कहते हैं कि भगवान मंगल भवन हैं। अगर वे वह प्रार्थना पूरी कर देते, तो अमंगल हो जाता — इसलिए उन्होंने पूरी नहीं की 27:34। हमारे मन में था कि "यह तो होना ही चाहिए था" — यही हमारी कमज़ोरी है।
वे समझाते हैं कि हम सोचते हैं — मुकदमा जीत जाऊँ, इतना पैसा मिल जाए, नौकरी लग जाए, तो मेरा मंगल हो जाएगा। पर भगवान आगे तक देखते हैं: मुकदमा जीत गए तो माया में फँस जाओगे। तब हर रास्ता बंद होता जाता है, कोई साथ नहीं देता, मन निराश हो जाता है — और उसी निराशा में हृदय से निकलता है, "हे अशरण-शरण, आपके सिवा मेरा कोई नहीं।" ऐसा व्यक्ति गृहस्थ रहते हुए भी भगवान के मार्ग पर चल पड़ता है और महान भक्त बन जाता है 27:34।
भगवान किसी प्रार्थना को पूरा नहीं करते, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने सुना नहीं — इसका अर्थ है कि वे हमें किसी ऐसे अमंगल से बचा रहे हैं जो हमें अभी दिखाई नहीं देता।
इसीलिए महाराज जी कहते हैं कि हर परिस्थिति में कृपा का दर्शन करो — 'ना' में भी 27:34।
संकट में ही भगवान को याद करना क्या स्वार्थ है?
एक और बहन को यह चिंता थी कि वह परेशानी में ही भगवान को ज़्यादा याद करती है, कहीं यह स्वार्थ तो नहीं। महाराज जी का उत्तर बहुत प्यार भरा था। भगवान हमारे स्वामी हैं, हमारे पिता हैं — इसलिए सुख और दुःख दोनों में उनसे मिले रहें। सुख है तो उनकी दया है, दुःख है तो वह भी उनकी कृपा है 6:57।
वे कहते हैं कि दुःख में सबसे पहले जिसकी याद आती है, वही हमारा असली आश्रय है। द्रौपदी जी ने पहले पतियों की ओर देखा, फिर भीष्म आदि बड़ों की ओर, फिर अपने बल पर भरोसा किया — और भगवान आख़िर में याद आए। जब उन्होंने पूरे भाव से पुकारा, तो भगवान तुरंत आ गए 6:57। भगवान केवल शब्द नहीं, भाव सुनते हैं, क्योंकि वे दूर नहीं — आपके हृदय में बैठे हैं 6:57।
तो अपने को स्वार्थी मत कहिए; अपने को उनका बच्चा मानिए। बच्चा माता-पिता से कहता है — "कोई ज़रूरत होगी तो आपसे कहूँगा, नहीं होगी तब भी आपका ही हूँ।" यही भाव सत्संग सिखाता है 6:57।
प्रार्थना कैसे करें कि श्रद्धा न टूटे?
यह सबसे काम की बात है। महाराज जी दो बातें बताते हैं 6:57:
- माँगिए केवल भगवान से, और उन्हें छूट दे दीजिए। अपनी ज़रूरत बताइए — व्यापार, स्वास्थ्य, परिवार — फिर कहिए, "आप जैसे उचित समझें, वैसे दीजिए।"
- हर प्रार्थना के साथ एक पंक्ति जोड़िए: "अगर आपको उचित न लगे, तो मेरी प्रार्थना पूरी मत करना।"
क्यों? क्योंकि अगर हमने दुःख दूर होने की प्रार्थना की और वह दूर नहीं हुआ, तो मन में संशय आ जाता है — "पूजा भी करते हैं, भजन भी करते हैं, फिर भी समाधान नहीं।" महाराज जी कहते हैं, श्रद्धा कम होना ही सब कुछ बिगड़ जाना है। यह एक पंक्ति हमारी श्रद्धा को बचा लेती है 6:57।
सत्संग में मनौती की बात भी आई। लोग मन्नत माँगते हैं, काम हो जाता है, फिर समय बीतने पर संकल्प भूल जाते हैं। महाराज जी कहते हैं कि जो संकल्प भगवान के सामने लिया, उसे पूरा करना चाहिए, और भूल गए हों तो अब कर लेना चाहिए 33:40। पर आगे के लिए वे एक सरल रास्ता बताते हैं — संकल्प का सौदा मत करो, बस प्रार्थना करो। माता-पिता से कोई सौदा थोड़े करता है; सब कुछ उन्हीं का तो है। बस इतना कहो, "भगवान, आप सर्व-समर्थ हैं, मेरे सामने यह संकट है, कृपा करके दूर कर दीजिए" 33:40।
गीता भी यही भरोसा देती है: जो अनन्य भाव से भगवान को भजते हैं, उनकी कमी भगवान पूरी करते हैं और जो उनके पास है उसकी रक्षा करते हैं (गीता 9.22)। और भगवान को कोई महँगी भेंट नहीं चाहिए — प्रेम से दिया गया एक पत्ता, एक फूल, थोड़ा जल भी वे स्वीकार करते हैं (गीता 9.26)।
जब लगे कि भगवान नहीं सुन रहे — एक सरल अभ्यास
- हर सुबह (5 मिनट): ठाकुर जी के चित्र के सामने बैठिए या आँखें बंद कर लीजिए। बच्चे की तरह अपनी बात सच्चाई से कहिए। अंत में कहिए: "अगर यह मेरे लिए ठीक नहीं, तो मत देना — बस मुझे अपनी याद मत भूलने देना।"
- दिन भर: जो नाम प्यारा लगे — "राधा", "कृष्ण", "राम" — काम करते, चलते, इंतज़ार करते समय मन में चलता रहे।
- जब उत्तर 'ना' हो: रुककर कहिए, "इसमें भी कृपा है, भले अभी न दिखे" 27:34।
- अच्छे समय में: उतने ही मन से धन्यवाद कीजिए, ताकि रिश्ता केवल संकट का न रहे 6:57।
- अगर कोई संकल्प अधूरा है: शांति से पूरा कर लीजिए, और आगे से सौदा नहीं, प्रार्थना कीजिए 33:40।
- 40 दिन तक लगातार कीजिए और देखिए — परिस्थिति से पहले आपका मन बदलने लगेगा।
अगर लंबे इंतज़ार से मन बहुत निराश या उदास रहने लगा है, तो किसी अपने से बात कीजिए, और ज़रूरत लगे तो काउंसलर या डॉक्टर से भी मिलिए। भारत में Tele-MANAS (14416) मुफ़्त है और 24 घंटे उपलब्ध है।
मन हो तो यह भी पढ़िए — अच्छे लोगों को दुःख क्यों मिलता है और भगवान की शरणागति का असली अर्थ।
भगवान ने आपसे मुँह नहीं मोड़ा है। उनसे अपनों की तरह बात करते रहिए। एक दिन पीछे मुड़कर देखेंगे, तो पाएँगे कि जिन प्रार्थनाओं को आप 'अनसुनी' समझ रहे थे, उन्हें भी उन्होंने बड़े प्यार से सँभाल कर रखा था।
श्रीमद्भगवद्गीता से
Bhagavad Gita 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य जुड़े भक्तों का योग-क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
गीता 9.22 का पूरा अर्थ →Bhagavad Gita 9.26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
जो प्रेमपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, प्रेम से दिए गए उस उपहार को मैं स्वीकार करता हूँ।
गीता 9.26 का पूरा अर्थ →मूल सत्संग में सुनें
इस लेख के आधार एकांतिक वार्तालाप के अंश — सही समय से शुरू होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अगर सब कर्मों के हिसाब से ही मिलता है, तो प्रार्थना का क्या लाभ?
एकांतिक वार्तालाप में महाराज जी बताते हैं कि प्रार्थना और भजन भाग्य से अलग चीज़ हैं। भाग्य में जो लिखा है वह तो मिलेगा ही, पर प्रार्थना से जो मिलता है वह भगवान अपनी कृपा से देते हैं — जैसे मज़दूर की परेशानी सुनकर मालिक उसकी तय मज़दूरी से कहीं ज़्यादा दे दे।
क्या केवल संकट में भगवान को याद करना स्वार्थ है?
दुःख में भगवान को पुकारना ग़लत नहीं — गीता में संकट से छूटना चाहने वाले को भी भक्त कहा गया है। पर महाराज जी कहते हैं कि सुख-दुःख दोनों में उनसे जुड़े रहें, जैसे बच्चा माता-पिता से जुड़ा रहता है, ताकि भगवान हमारा पहला सहारा हों, आख़िरी नहीं।
मैंने मनौती मानी थी, काम हो गया पर संकल्प पूरा नहीं किया। अब क्या करूँ?
सत्संग में बताया गया है कि भगवान के सामने लिया संकल्प पूरा करना चाहिए; भूल गए हों तो अब कर लीजिए। भगवान माता-पिता की तरह क्षमा कर देते हैं, पर वचन निभाने से अपना मन हल्का रहता है। आगे के लिए महाराज जी सलाह देते हैं कि सौदा मत कीजिए, बस प्रार्थना कीजिए।
कैसे पता चले कि मेरी प्रार्थना भगवान तक पहुँच रही है?
भगवान कहीं दूर नहीं, आपके हृदय में हैं और आपका भाव देखते हैं। महाराज जी समझाते हैं कि भाव से भरी पुकार कभी अनसुनी नहीं जाती, जैसे द्रौपदी जी की पुकार। उत्तर 'हाँ' हो या 'अभी नहीं', भरोसा रखिए कि वह आपके मंगल के लिए ही है।
आपके मन में भी कोई प्रश्न है?
सारथी से हिंदी, English या Hinglish में पूछिए — सत्संग पर आधारित उत्तर, स्रोत के साथ।
यह लेख ऊपर दिए गए सत्संग स्रोतों के आधार पर AI (Claude) की सहायता से लिखा गया है। स्रोत स्वतः-लिखित (auto-transcribed) हैं — सटीक शब्दों के लिए मूल वीडियो सुनें। सारथी एक स्वतंत्र प्रोजेक्ट है; यह पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज, उनके आश्रम या भजन मार्ग चैनल से संबद्ध या उनके द्वारा अनुमोदित नहीं है। यह चिकित्सा, कानूनी या मानसिक-स्वास्थ्य सलाह का विकल्प नहीं है।
और पढ़ें

नाम जप और भक्ति
भगवान की शरणागति का अर्थ क्या है?
शरणागति हार मान लेना या प्रार्थना की एक पंक्ति नहीं है। एकांतिक वार्तालाप में वाणी, तन, मन और स्वयं के समर्पण के बारे में क्या समझाया गया है, जानिए।
13 अक्टूबर 2026 · 5 मिनट

नाम जप और भक्ति
भक्ति की शुरुआत कैसे करें? नए साधकों के लिए पहले कदम
भक्ति में नए हैं और समझ नहीं आता कहाँ से शुरू करें? एकांतिक वार्तालाप के सरल पहले कदम — नाम जप, पवित्र आचरण, परिवार की सेवा — और भय से आना भी ग़लत क्यों नहीं।
12 अक्टूबर 2026 · 6 मिनट

नाम जप और भक्ति
नाम जप में मन कैसे लगाएँ? एकांतिक वार्तालाप से सरल मार्गदर्शन
नाम जप में बैठते ही मन क्यों भागता है, यह हार क्यों नहीं है, और एकांतिक वार्तालाप में बताए उपाय जिनसे मन बार-बार नाम में लौटता है — जानिए इस लेख में।
12 अक्टूबर 2026 · 6 मिनट



