दूसरों से ईर्ष्या कैसे छोड़ें? एकांतिक वार्तालाप से उपाय
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संक्षेप में उत्तर
एकांतिक वार्तालाप में पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि किसी को अपने से आगे बढ़ता देखकर जो जलन होती है, वही ईर्ष्या यानी मत्सर है — और यह छह विकारों में से एक है जो सबके भीतर हैं। इसकी जड़ यह है कि हम सामने केवल व्यक्ति देखते हैं, उसमें बैठे भगवान को नहीं। उपाय: जैसे ही जलन उठे, मन में कहिए — 'प्रभु, इस रूप में भी आप ही हो, मुझे क्षमा करो'; और रोज़ नाम जप, सत्संग और स्वाध्याय कीजिए ताकि हृदय शीतल हो।
किसी दोस्त की तरक्की हो जाती है, किसी रिश्तेदार ने नया घर ले लिया, या मंदिर में कोई आपसे ज़्यादा भक्ति करता दिखता है। मुँह से हम "बधाई हो" कहते हैं, पर भीतर कुछ चुभता है, जलता है — और फिर इस भाव पर ही शर्म आने लगती है। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो अपने ऊपर कठोर मत होइए। ईर्ष्या बहुत मानवीय भाव है, और एकांतिक वार्तालाप में कितने ही सच्चे साधकों ने इसके बारे में पूछा है।
इस विषय पर महाराज जी की शिक्षा बहुत कोमल और व्यावहारिक है — ईर्ष्या असल में क्या है, मन बार-बार तुलना क्यों करता है, और जलन उठते ही भीतर कौन-सा छोटा-सा परिवर्तन करना है।
ईर्ष्या असल में है क्या?
एकांतिक वार्तालाप में पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज इसका पुराना नाम बताते हैं — मत्सर। कोई हमसे आगे निकलता दिखे और यह देखकर भीतर जलन हो, उसी जलन का नाम ईर्ष्या है। वे इसे छह विकारों में गिनाते हैं — काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — और कहते हैं कि ये सबके भीतर हैं 5:40। आप अकेले नहीं हैं, बस मनुष्य हैं।
साथ ही वे सावधान भी करते हैं कि ये छह विकार पतन कराने वाले हैं। और इन पर विजय केवल हठ से नहीं मिलती — भजन से मिलती है: नाम जप, भगवान की शरणागति और उनकी लीला-कथा सुनना 5:40।
मन बार-बार दूसरों से तुलना क्यों करता है?
एक प्रश्नकर्ता ने कहा कि प्रतिस्पर्धा के इस ज़माने में मन न खुद खुश रहता है, न दूसरों को देखकर प्रसन्न होता है। महाराज जी का उत्तर चौंकाने वाला है: सबसे आगे बढ़ने की यह चाह भीतर की एक सच्ची बात से आती है। हम भगवान के अंश हैं, जो सबसे बड़े हैं — इसलिए हमारे भीतर पूर्ण और अविनाशी होने की ललक है 0:00।
गड़बड़ यह हुई कि इस चाह की दिशा गलत हो गई। हम बदलने वाले, नाशवान भोगों से सुखी होना चाहते हैं, और दूसरों में केवल शरीर और व्यक्तित्व देखते हैं — फिर राग-द्वेष होने लगता है। पर महाराज जी समझाते हैं कि जो आपके भीतर बैठा है, वही उसके भीतर भी बैठा है। अगर वह अपने कर्मों के अनुसार उन्नति या अवनति पा रहा है, तो हम क्यों जलें, क्यों भीतर दुखी हों 0:00?
श्रीमद्भगवद्गीता भी यही बात दूसरी तरह कहती है: दूसरे का मार्ग अच्छी तरह निभाने से अपना मार्ग अधूरा निभाना भी श्रेष्ठ है (गीता 3.35)। उसका रास्ता उसका है, आपका रास्ता आपका।
छोटी-छोटी बातों पर जलन क्यों भड़क उठती है?
कुछ लोग कहते हैं, "मुझे तो बात-बात पर जलन होती है।" महाराज जी इसका कारण बताते हैं — भजन की कमी। जब अंतःकरण हल्का और मलिन हो जाता है, तो वह क्षण में रूठता है और क्षण में प्रसन्न होता है 0:00।
वे बताते हैं कि भजन से जब हृदय शीतल हो जाता है, तो कोई धक्का दे दे, अपमान कर दे, निंदा कर दे, तब भी मन उसकी उपेक्षा कर देता है — "यह उसकी मति है, उसका विचार है" — और हम तुरंत अपने मन को संभाल लेते हैं 0:00। पर बिना संभाला हुआ मन छोटी-छोटी बातों में जलाता रहेगा। मन संभालने के लिए वे तीन चीज़ें अत्यंत आवश्यक बताते हैं: नाम जप, सत्संग और शास्त्रों का स्वाध्याय 0:00।
जैसे ही ईर्ष्या उठे, उस समय क्या करें?
यह शिक्षा का सबसे सुंदर भाग है। एक भक्त ने बताया कि उन्हें दूसरों से इस बात की ईर्ष्या होती है कि वे उनसे ज़्यादा नाम जप करते हैं। महाराज जी का उत्तर हर तरह की ईर्ष्या पर लागू होता है: पहले यह समझिए कि सामने केवल व्यक्ति नहीं, भगवान विराजमान हैं 9:31।
इसलिए वे कहते हैं कि जहाँ भी ईर्ष्या हो, द्वेष बने, या प्रतिकूलता का भान हो, वहाँ तत्काल भगवत भाव कीजिए 9:31। मन में कहिए:
"हे भगवान, इस रूप में भी आप ही हो। मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही, इसलिए द्वेष हो रहा है। हे नाथ, मुझे क्षमा करो।"
महाराज जी कहते हैं कि ऐसा करने से शांति मिलेगी और द्वेष का भाव नष्ट हो जाएगा 9:31। जब सबमें अपने प्रभु ही रमे हैं, तो ईर्ष्या किससे करें 5:40?
गीता उस भक्त को भगवान का प्रिय बताती है जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, सबका मित्र और करुणामय है (गीता 12.13)। यह अपने को कोसने का पैमाना नहीं, चलने की दिशा है।
ईर्ष्या के लिए रोज़ का सरल अभ्यास
- सुबह (5–10 मिनट): अपने प्रिय नाम का जप कीजिए। यही वह नींव है जो हृदय को शीतल रखती है 5:400:00।
- जब जलन उठे: उस भाव से लड़िए मत। मन में उस व्यक्ति की ओर मुड़कर कहिए — "प्रभु, इस रूप में भी आप हो, मुझे क्षमा करो" 9:31।
- कर्म को याद कीजिए: अपने से कहिए — "इसकी उन्नति इसके कर्मों से है, मेरा इसमें कुछ नहीं घटता" 0:00।
- मन को अच्छा भोजन दीजिए: दूसरों की चमक-दमक देखने के बजाय रोज़ थोड़ा सत्संग सुनिए या शास्त्र का एक पन्ना पढ़िए 0:00।
- रात को: आज जिससे ईर्ष्या हुई, उसे याद करके सच्चे मन से उसका मंगल चाहिए।
इसमें समय लगेगा। हर बार जब आप जलन को पकड़कर प्रार्थना में बदलते हैं, आप वह गाँठ ढीली कर रहे होते हैं जो जन्मों से बँधी है 0:00।
अगर तुलना लगातार उदासी या अपने को बेकार समझने में बदल गई हो, तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति या काउंसलर से भी बात कीजिए। भारत में Tele-MANAS (14416) मुफ़्त है और 24 घंटे उपलब्ध है।
ईर्ष्या अक्सर अहंकार और क्रोध के साथ चलती है, इसलिए अहंकार कैसे मिटाएँ और क्रोध पर नियंत्रण भी पढ़िए।
धैर्य रखिए। जो हृदय सबमें भगवान को देखना सीख लेता है, उसे धीरे-धीरे पता चलता है कि ईर्ष्या करने को कोई बचा ही नहीं — बस प्रेम करने को सब हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता से
Bhagavad Gita 3.35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
दूसरे के धर्म को भली-भाँति निभाने से अपने धर्म को अपूर्ण रूप से निभाना भी श्रेष्ठ है।
गीता 3.35 का पूरा अर्थ →Bhagavad Gita 12.13
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और करुणावान है, ममता और अहंकार से रहित, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील है —
गीता 12.13 का पूरा अर्थ →मूल सत्संग में सुनें
इस लेख के आधार एकांतिक वार्तालाप के अंश — सही समय से शुरू होते हैं।
5:40इस उत्तर का स्रोतईर्ष्या से बचने के उपाय क्या हैं?5:40 से · 2 मिनट
0:00इस उत्तर का स्रोतCompetition के जमाने में दूसरों को देखकर जलन होती है, क्या करूँ ?0:00 से · 16 मिनट
0:00इस उत्तर का स्रोतमुझे दूसरों से बात बात पर जलन होती है। मैं क्या करूं?0:00 से · 1 मिनट
9:31इस उत्तर का स्रोतदूसरों को देखकर ईर्ष्या होती है कि वो हमसे ज्यादा नाम जप कर रहा है!9:31 से · 2 मिनट
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भक्ति मार्ग पर होते हुए भी ईर्ष्या होती है, क्या यह गलत है?
ऐसा होना स्वाभाविक है। एकांतिक वार्तालाप में महाराज जी बताते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — ये छह विकार सबके भीतर हैं, और मत्सर को ही ईर्ष्या कहते हैं। इसके होने से आप बुरे नहीं हो जाते। ज़रूरी यह है कि उसे पोषण न दें और नाम जप व सत्संग से धीरे-धीरे उसे कमज़ोर करें।
कोई मुझसे ज़्यादा नाम जप करता है तो भी जलन होती है, क्या करूँ?
ठीक यही प्रश्न एकांतिक वार्तालाप में पूछा गया था। उत्तर था कि पहले यह समझिए — सामने व्यक्ति नहीं, भगवान हैं। जैसे ही जलन उठे, उसे प्रार्थना बना दीजिए: 'हे प्रभु, इस रूप में भी आप हो, मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही, मुझे क्षमा करो।' ऐसा करने से शांति मिलती है और द्वेष का भाव नष्ट होने लगता है।
दोस्तों और सहकर्मियों से तुलना करना कैसे छोड़ूँ?
याद रखिए कि हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार उन्नति-अवनति पाता है, और जो आपके भीतर बैठा है वही उसके भीतर भी है। उसकी सफलता आपसे कुछ नहीं छीनती। गीता भी कहती है कि दूसरे का मार्ग अच्छी तरह निभाने से अपना मार्ग अधूरा निभाना भी श्रेष्ठ है (गीता 3.35)। अपनी ऊर्जा अपने कर्तव्य और भजन में लगाइए।
छोटी-छोटी बातों पर इतनी जलन क्यों होती है?
महाराज जी कहते हैं कि यह भजन की कमी है। जब अंतःकरण हल्का और मलिन हो जाता है, तो क्षण में नाराज़ और क्षण में प्रसन्न होता रहता है। नाम जप, भगवान की कथा और शास्त्रों का स्वाध्याय हृदय को शीतल करते हैं, फिर बड़ी बात भी मन को नहीं हिलाती।
आपके मन में भी कोई प्रश्न है?
सारथी से हिंदी, English या Hinglish में पूछिए — सत्संग पर आधारित उत्तर, स्रोत के साथ।
यह लेख ऊपर दिए गए सत्संग स्रोतों के आधार पर AI (Claude) की सहायता से लिखा गया है। स्रोत स्वतः-लिखित (auto-transcribed) हैं — सटीक शब्दों के लिए मूल वीडियो सुनें। सारथी एक स्वतंत्र प्रोजेक्ट है; यह पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज, उनके आश्रम या भजन मार्ग चैनल से संबद्ध या उनके द्वारा अनुमोदित नहीं है। यह चिकित्सा, कानूनी या मानसिक-स्वास्थ्य सलाह का विकल्प नहीं है।
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