अहंकार कैसे मिटाएँ? अभिमान छोड़ने का सच्चा उपाय
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संक्षेप में उत्तर
एकांतिक वार्तालाप में पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि अहंकार उन चीज़ों का घमंड है जो सच में हमारी हैं ही नहीं — विद्या, रूप, कुल, धन, जवानी और बल। 'मुझमें अहंकार नहीं है' — ऐसा कहना भी अहंकार का ही लक्षण है। अभिमान करना ही हो तो बस इसका कि 'मैं भगवान का हूँ।' उपाय: जब भी किसी काम का गर्व उठे, याद कीजिए कि शरीर, सामर्थ्य और फल — सब भगवान का दिया है, और नाम जप करते रहिए ताकि 'मैं' नहीं, भक्ति बढ़े।
कोई अच्छा काम किया — किसी की मदद की, ऑफ़िस में तारीफ़ मिली, माला पूरी हो गई — और भीतर से धीमी-सी आवाज़ आई, "देखो, मैं कितना अच्छा हूँ।" या किसी ने कह दिया कि आप घमंडी लगते हैं, और बात चुभ गई, क्योंकि आपको सच में ऐसा नहीं लगता।
अहंकार को अपने भीतर देखना सबसे कठिन है, क्योंकि देखने वाला भी वही है। अच्छी बात यह है कि सत्संग हमें 'मैं' की और ज़्यादा ताकत लगाकर उससे लड़ने को नहीं कहता। वह बताता है कि घमंड आता कहाँ से है, उसकी जगह क्या रखना है, और रोज़ कैसे अभ्यास करना है।
अहंकार असल में है क्या?
एकांतिक वार्तालाप में महाराज जी अहंकार के अनेक रूप गिनाते हैं — विद्या का, रूप का, कुल का, धन का, जवानी का, बल का, और भी कई तरह का 8:13। एक और सत्संग में वे जाति, चतुराई, अपनी वस्तुओं और संबंधों के अभिमान की बात भी करते हैं 16:59। इन सबमें एक बात समान है — ये सब शरीर और संसार से जुड़े हैं, हमारे असली स्वरूप से नहीं।
वे एक सीधी-सी बात सोचने को कहते हैं: सिर का एक बाल भी गिर जाए, तो आप उसे दोबारा लगा नहीं सकते 8:13। बाल सफ़ेद होने से रोकना चाहें, तो भी नहीं रोक सकते। यह शरीर भी आपने नहीं बनाया — आप बनाते तो अपनी पसंद से और लंबा, और गोरा बना लेते। तो फिर अभिमान किस बात का 8:13? करने का बल भी परमात्मा से मिल रहा है और फल भी। हमें बस इतनी छूट मिली है कि पाप और पुण्य कर्म में सही निर्णय करें — हल, बैल, बीज और खेत, सब उसी के हैं 8:13।
गीता भी यही कहती है: सारे कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं, पर अहंकार से मोहित व्यक्ति सोचता है, "मैं ही करने वाला हूँ" (गीता 3.27)।
मुझे घमंड नहीं लगता, फिर भी लोग ऐसा क्यों समझते हैं?
यह प्रश्न बहुत लोग पूछते हैं, और महाराज जी का उत्तर प्रेम से भरा पर बिल्कुल साफ़ है। "मुझमें अहंकार नहीं है" — ऐसा कहना ही अहंकार का लक्षण है, जैसे मरीज़ डॉक्टर से अड़ जाए कि मैं बीमार नहीं हूँ 33:06। आपको यह प्रमाण किसने दिया कि आपमें अभिमान नहीं? आपके ही मन ने — और अभिमान वहीं तो बैठा है 33:06।
वे बड़े-बड़े भक्तों की वाणी याद दिलाते हैं। हनुमान जी, जिन्हें ज्ञानियों में अग्रणी और महाबली कहा गया, श्री राम के सामने स्वयं को मंद और अधम कहते हैं। शबरी जी जैसी महान भक्ता कहती हैं कि मैं अधम से भी अधम नारी हूँ। गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि अपने अवगुणों की कथा कहूँ तो पूरा ग्रंथ बन जाए 33:06। महाराज जी कहते हैं, जब सच में घमंड नहीं रहता तो भाव आता है — "मैं समस्त जीवों से नीचा हूँ" — और यह बात संत पहचानते हैं कि यह निरभिमानी है, वह व्यक्ति खुद नहीं कहता 33:06।
इसका अर्थ खुद को गिराना नहीं है। इसका अर्थ है — यह साबित करने की ज़रूरत छोड़ देना कि "मैं अच्छा हूँ।"
अभिमान और स्वाभिमान में क्या अंतर है?
बहुत लोग कहते हैं, "अहंकार छोड़ देंगे, पर स्वाभिमान तो रखना पड़ेगा।" महाराज जी पूछते हैं — आप स्वाभिमान किसे कहते हैं? अक्सर निकलता है जाति, कुल, विद्या, धन या पद का गर्व — और यही तो अभिमान है, बस नाम अच्छा रख दिया 16:59।
सच्चा स्वाभिमान, वे समझाते हैं, 'स्व' से जुड़ा है — "मैं भगवान का हूँ," "मैं प्रभु का अंश हूँ" 16:59। यह परम पवित्र है, इसे कोई मिटा नहीं सकता। और जब इसका अनुभव होता है, तो जो मेरे भीतर है वही सबके भीतर दिखता है — फिर राग-द्वेष हो ही नहीं सकता 16:59। जहाँ लड़ाई-झगड़ा है, वहाँ अहंकार है — चाहे हम उसे स्वाभिमान कह दें 16:59।
तो किसी के आगे झुककर दबे रहने की बात नहीं है। बस अपनी कीमत को बदलती हुई चीज़ों से हटाकर उस एक सच्चाई पर टिका देना है जो कभी नहीं बदलती।
भक्ति से अहंकार कैसे मिटता है?
एक साधक ने पूछा कि भक्ति और समर्पण कुछ समय रहता है, फिर अभिमान आ जाता है। महाराज जी का उत्तर गहरा है: अगर अभिमान आ जाता है, तो जिसे आप भक्ति कह रहे हैं वह अभी क्रिया है — भक्ति अभी जागी नहीं। भक्ति आ जाएगी, तो अहंकार के रहने का कोई चांस ही नहीं रहता 8:13।
जब तक अंतःकरण में अज्ञान है और सत्संग का रंग भीतर नहीं चढ़ा, तब तक अहंकार जागता रहता है 8:13। इसका इलाज साधना छोड़ना नहीं, उसे और गहरा करना है। वे कहते हैं, अहंकार करना ही हो तो इस बात का करो कि "मैं भगवान का जन हूँ, वे मेरे प्रभु हैं" 8:13। जैसे-जैसे यह भाव बढ़ेगा, देह का, धन का, माया की किसी भी चीज़ का अभिमान अपने आप छूटता जाएगा।
गीता में भगवान अपने प्रिय भक्त के लक्षण बताते हैं — जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रता और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से रहित है (गीता 12.13)। यह स्वभाव ज़बरदस्ती ओढ़ा नहीं जाता; भगवान से प्रेम बढ़ने पर अपने आप खिलता है।
अहंकार ढीला करने का रोज़ का अभ्यास
- सुबह का अर्पण (2 मिनट)। दिन शुरू करने से पहले मन में कहिए: "आज जो भी करूँगा, बल आपका है और फल भी आपका" 8:13।
- सफलता के बाद 'मैं' को पकड़िए। अच्छा रिज़ल्ट, तारीफ़ या जप की गिनती — जब भी गर्व उठे, रुकिए और उस बाल को याद कीजिए जिसे आप वापस नहीं लगा सकते 8:13। फिर कुछ बार "राधा राधा" या अपना इष्ट नाम लीजिए।
- सफ़ाई मत दीजिए, विचार कीजिए। कोई आपको घमंडी या रूखा कहे, तो बहस मत कीजिए। देखिए कि वह कहाँ सही हो सकता है, और दीनता के लिए प्रार्थना कीजिए 33:06।
- अपने 'स्वाभिमान' को जाँचिए। किसी बहस में देखिए कि क्या आप अपनी जाति, डिग्री, पद या छवि बचा रहे हैं। अगर हाँ, तो वह अभिमान है — उसे जाने दीजिए 16:59।
- रोज़ किसी दीन संत की एक पंक्ति पढ़िए। तुलसीदास जी की चौपाई या हनुमान जी की विनती मन के सामने सही तस्वीर रखती है 33:06।
- शाम को 5 मिनट का हिसाब। बिना अपराध-बोध के लिखिए कि आज कब 'मैं' हावी हुआ, और उसे भगवान को अर्पित कर दीजिए।
अगर अहंकार अक्सर गुस्से के रूप में बाहर आता है, तो क्रोध पर नियंत्रण कैसे करें भी पढ़िए, और जब घमंड को ठेस लगे, उन पलों के लिए अपमान और निंदा को शांति से कैसे सहें।
अहंकार एक दिन में नहीं जाता, और इससे अकेले जीतना भी नहीं है। हर बार जब आप याद करते हैं कि "मैं भगवान का हूँ," यह 'मैं' थोड़ा हल्का हो जाता है। आज के पहले छोटे-से अर्पण से शुरुआत कीजिए।
श्रीमद्भगवद्गीता से
Bhagavad Gita 3.27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥
सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, परंतु अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है — “मैं ही कर्ता हूँ।”
गीता 3.27 का पूरा अर्थ →Bhagavad Gita 12.13
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और करुणावान है, ममता और अहंकार से रहित, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील है —
गीता 12.13 का पूरा अर्थ →मूल सत्संग में सुनें
इस लेख के आधार एकांतिक वार्तालाप के अंश — सही समय से शुरू होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लोग मुझे घमंडी समझते हैं, पर मुझे अपने में अहंकार नहीं दिखता। क्या करूँ?
एकांतिक वार्तालाप में महाराज जी इसे ऐसे समझाते हैं जैसे मरीज़ डॉक्टर से कहे कि 'मैं बीमार नहीं हूँ।' 'मुझमें अहंकार नहीं' — यह पक्का निर्णय भी अहंकार ही करवाता है। अपनी सफ़ाई देने के बजाय शांति से देखिए कि लोगों को कहाँ घमंड दिख रहा होगा, और भगवान से दीनता माँगिए।
क्या स्वाभिमान भी छोड़ना पड़ेगा?
जिसे हम आम तौर पर स्वाभिमान कहते हैं — जाति, कुल, डिग्री, धन या पद का गर्व — महाराज जी कहते हैं वह तो अभिमान ही है। सच्चा स्वाभिमान है 'मैं प्रभु का हूँ, उनका अंश हूँ।' इसे कोई मिटा नहीं सकता, और इससे कभी झगड़ा नहीं होता।
सेवा या नाम जप करके भी मन में गर्व आ जाता है, क्या करूँ?
महाराज जी बताते हैं कि अगर अभिमान आता है, तो अभी भक्ति हृदय में उतरी नहीं; जिसे हम भक्ति कहते हैं, वह अभी क्रिया ही है। साधना छोड़िए मत, सच्चे मन से करते रहिए और याद रखिए कि करने का बल भी भगवान ने दिया है। जैसे-जैसे भक्ति बढ़ेगी, गर्व के लिए जगह नहीं बचेगी।
अहंकार मिटाने का मतलब क्या खुद को बेकार समझना है?
नहीं। दीनता का मतलब अपने से नफ़रत करना नहीं है। जिन संतों ने खुद को अधम कहा, वे भक्ति और सामर्थ्य से भरे थे। बात बस इतनी है कि भगवान की दी हुई चीज़ों का श्रेय खुद न लें — और यह याद रखें कि हम भगवान के अविनाशी अंश हैं।
आपके मन में भी कोई प्रश्न है?
सारथी से हिंदी, English या Hinglish में पूछिए — सत्संग पर आधारित उत्तर, स्रोत के साथ।
यह लेख ऊपर दिए गए सत्संग स्रोतों के आधार पर AI (Claude) की सहायता से लिखा गया है। स्रोत स्वतः-लिखित (auto-transcribed) हैं — सटीक शब्दों के लिए मूल वीडियो सुनें। सारथी एक स्वतंत्र प्रोजेक्ट है; यह पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज, उनके आश्रम या भजन मार्ग चैनल से संबद्ध या उनके द्वारा अनुमोदित नहीं है। यह चिकित्सा, कानूनी या मानसिक-स्वास्थ्य सलाह का विकल्प नहीं है।
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