आलस्य कैसे दूर करें? 'कल कर लूँगा' की आदत से छुटकारा
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संक्षेप में उत्तर
एकांतिक वार्तालाप में पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि करने योग्य काम को 'कल कर लेंगे, परसों कर लेंगे' कहकर टालना ही आलस्य है, और यह तमोगुण से आता है। तीनों गुणों का चक्र सबमें चलता है, इसलिए सतोगुण बढ़ाना और तमोगुण दबाना है — सात्विक और सीमित भोजन, पवित्र दृश्य, और नाम जप व सत्संग से भीतर का बल। पहला कदम: जो काम आप टाल रहे हैं, उसे आज ही, मन के बहाना बनाने से पहले कर डालिए।
अलार्म बजा और फिर से बंद कर दिया। असाइनमेंट, ज़रूरी फ़ोन, अटकी हुई फ़ाइल — "खाने के बाद कर लूँगा... कल पक्का।" दिन निकलते जाते हैं, काम की सूची बढ़ती जाती है, और साथ में अपने आप से एक चुपचाप-सी निराशा भी। कभी-कभी यह भजन तक पहुँच जाता है: सोचा था माला करेंगे, कुछ पढ़ेंगे, थोड़ी देर बैठेंगे — और दिन यूँ ही फिसल गया।
आलस्य कोई ऐसा दोष नहीं जो आपको बुरा इंसान बना दे। सत्संग इसे मन और शरीर की एक अवस्था के रूप में समझाता है, जिसके कारण साफ़ हैं — और इसलिए उपाय भी साफ़ हैं। जब समझ आ जाता है कि यह आता कहाँ से है, तो कदम उठाना बहुत आसान हो जाता है।
आलस्य असल में है क्या?
एकांतिक वार्तालाप में महाराज जी बहुत सधा हुआ अंतर बताते हैं। जो काम हमें करना है, उसे टालते रहना — "कल कर लेंगे, परसों कर लेंगे" — इसे अकर्मण्यता कहते हैं, और यह आलस्य के अंतर्गत आती है 1:35। प्रमाद इससे जुड़ा पर गहरा है: करने योग्य काम न करना और न करने योग्य काम करना। यह तमोगुण का प्रधान लक्षण है, जिसमें मूढ़ता के कारण व्यक्ति गलत आचरण को सही और सही को गलत समझने लगता है 1:35।
यह समझ काम की है, क्योंकि इससे पता चलता है कि आलस्य केवल "थकान" नहीं, टालने का एक ढर्रा है। और ढर्रा बदला जा सकता है।
वे गृहस्थों के लिए भी एक बड़ी बात कहते हैं: घर-परिवार के कामों में व्यस्त रहना भजन छोड़ने का कारण नहीं है। जब युद्ध जैसे भयानक कर्म में भी भगवान का स्मरण हो सकता है, तो कोई भी कर्तव्य स्मरण के साथ किया जा सकता है — पति, पुत्र, सास, राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य निभाते हुए भगवान को याद रखना ही भजन है 1:35।
आलस्य बार-बार लौटकर क्यों आता है?
महाराज जी समझाते हैं कि सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण — इन तीन गुणों का चक्र हर व्यक्ति में चलता रहता है 12:5824:03। तमोगुण आता है तो निद्रा, आलस्य और प्रमाद आते हैं। रजोगुण आता है तो मकान, भोग, यश-कीर्ति का चिंतन चलता है। और सतोगुण आता है तो भगवान प्यारे लगने लगते हैं — नाम जप, कथा सुनना, दान करना, सब अच्छा लगता है 24:03।
तो प्रश्न यह नहीं कि "मैं आलसी क्यों हूँ," बल्कि "मैं किसे खिला रहा हूँ — सतोगुण को या तमोगुण को?" विवेक से देखना है कि सतोगुण बढ़ाएँ और रजोगुण-तमोगुण को दबाएँ 12:58। इसीलिए, वे कहते हैं, हमारा खानपान सात्विक हो और हमारे दृश्य भी सात्विक हों 12:58।
वे आज की एक बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: जेब में जो स्मार्ट मोबाइल है, उसमें हर गुण विराजमान है। गंदी या व्यर्थ चीज़ें देखेंगे, तो तमोगुण तो आएगा ही — क्योंकि जो देखते-सुनते हैं उसी का चिंतन होता है, और जो चिंतन होता है वही हमारे भीतर प्रकट होता है 12:58।
सब जानते हुए भी मैं काम क्यों नहीं कर पाता?
एक साधक ने पूछा कि बरसों भजन करने के बाद भी आलस-प्रमाद क्यों बना हुआ है। महाराज जी का उत्तर बहुत सच्चा था: धर्म-अधर्म का ज्ञान किसे नहीं है? जैसे ही गलत करने चलते हैं, भीतर से आवाज़ आती है कि यह गलत है 12:58। कमी ज्ञान की नहीं, उस पर चलने के आध्यात्मिक बल की है।
वे कहते हैं — तूणीर बँधा है, धनुष हाथ में है, पर निशाना लगाना कभी आया नहीं, तो फ़ायदा किस बात का 12:58? ज्ञान तभी काम का है जब वह आचरण में उतरे 12:58। और आचरण का बल नाम जप, सात्विक भोजन और सत्संग से आता है; तब पकड़ में आने लगता है कि गलती कहाँ हो रही है और सुधार कैसे करना है 12:58।
गीता भी यही कहती है: तुम्हारा अधिकार कर्म पर है — और अकर्म में भी आसक्ति मत रखो (गीता 2.47)।
कभी उत्साह, कभी कुछ भी नहीं — ऐसा क्यों?
यह बिल्कुल सामान्य है। महाराज जी याद दिलाते हैं कि कभी थोड़ा भजन होता है, कभी बहुत — यह केवल आपके साथ नहीं, सबके जीवन में होता है 24:03। ज़रूरी यह है कि नीचे वाले समय में धीरज न छूटे और हम गलत मार्ग न पकड़ें 24:03। मन न लगे, तो शांत रहकर उसे धीरे-धीरे थामे रखिए — गुण बदलेगा और रुचि लौट आएगी 24:03। अपने मार्ग पर चलते रहो, आगे जीत जाओगे 24:03।
वे शरीर के बारे में भी व्यावहारिक हैं। जब एक साधिका ने थायराइड के साथ भारी आलस्य और उठने-बैठने में कठिनाई की बात कही, तो उनकी पहली सलाह थी कि उस रोग की औषधि लीजिए 19:11। फिर उन्होंने भोजन का सरल नियम बताया: अगर आठ रोटी पा सकते हैं, तो चार पाइए; थाली में सीमित भोजन रखिए, भगवान को भोग लगाइए, और दोबारा मत लीजिए 19:11। ज़्यादा खाने से शरीर भारी और सुस्त होता है। (अगर हर समय थकान रहती है, तो डॉक्टर को ज़रूर दिखाइए — और चल रहा इलाज कभी बंद मत कीजिए।)
आलस्य का चक्र तोड़ने की 14 दिन की योजना
- टाला हुआ काम पहचानिए। हर सुबह लिखिए कि आज कौन-सा एक काम "कल" पर सबसे ज़्यादा टल सकता है। उसे सबसे पहले कीजिए 1:35।
- हल्का भोजन। थाली में सीमित भोजन रखिए, भगवान को अर्पित कीजिए, दोबारा मत लीजिए। ताज़ा, सादा, सात्विक भोजन चुनिए 12:5819:11।
- आँख-कान की रखवाली। सुबह और रात के खाने के बाद बेमतलब स्क्रॉल नहीं। जो देखेंगे, वही सोचेंगे 12:58।
- काम से पहले नाम। कोई भी काम शुरू करने से पहले दो-तीन मिनट नाम जप — इससे वह बल मिलता है जो केवल ज्ञान से नहीं मिलता 12:58।
- रोज़ सत्संग। आते-जाते या खाना बनाते समय 10–15 मिनट ही सही 12:58।
- ढीले दिन पर दिनचर्या मत छोड़िए। छोटा रूप कीजिए — तीस की जगह पाँच मिनट — और भरोसा रखिए कि गुण बदलेगा 24:03।
- सेहत की जाँच। भारीपन और थकान न जाए, तो डॉक्टर से जाँच करवाइए 19:11।
गीता यही प्रेरणा देती है: अपने मन से अपना उद्धार कीजिए, अपने को गिरने मत दीजिए (गीता 6.5)।
अच्छी सुबह से यह सब आसान हो जाता है — सुबह जल्दी कैसे उठें भी पढ़िए। और अगर घंटे मोबाइल में जाते हैं, तो मोबाइल की लत कैसे छोड़ें मदद करेगा।
रातों-रात बदल जाना ज़रूरी नहीं। आज वह एक टाला हुआ काम कर डालिए, उसे भगवान को अर्पित कीजिए, और कल की चिंता कल पर छोड़ दीजिए।
श्रीमद्भगवद्गीता से
Bhagavad Gita 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर कभी नहीं। फल को कर्म का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी आसक्त मत हो।
गीता 2.47 का पूरा अर्थ →Bhagavad Gita 6.5
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
अपने द्वारा अपना उद्धार करो, स्वयं को नीचे मत गिराओ। मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही उसका शत्रु।
गीता 6.5 का पूरा अर्थ →मूल सत्संग में सुनें
इस लेख के आधार एकांतिक वार्तालाप के अंश — सही समय से शुरू होते हैं।
1:35इस उत्तर का स्रोतगृहस्थ में शरणागति, अकर्मण्यता एवं प्रमाद में क्या अंतर है ?1:35 से · 11 मिनट
12:58इस उत्तर का स्रोतजीवन समाप्त होने जा रहा है, लंबे समय से भजन कर रहा हूं फिर भी आलस, प्रमाद बना हुआ है !12:58 से · 12 मिनट
24:03इस उत्तर का स्रोतप्रारंभ में नाम जप में आनंद आता था, पर अब उतार चढ़ाव आ रहा है।24:03 से · 2 मिनट
19:11इस उत्तर का स्रोतसंसार और गृहस्थ को निभाते हुए आध्यात्मिक लक्ष्य को जल्दी कैसे प्राप्त करें?19:11 से · 5 मिनट
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आलस्य और प्रमाद में क्या अंतर है?
एकांतिक वार्तालाप में महाराज जी बताते हैं कि जो काम करना है उसे 'कल कर लेंगे, परसों कर लेंगे' कहकर टालना अकर्मण्यता है, जो आलस्य के अंतर्गत आती है। प्रमाद इससे गहरा है — करने योग्य काम न करना और न करने योग्य काम करना, क्योंकि तमोगुण समझ को ढक देता है। दोनों का इलाज सतोगुण बढ़ाना है।
ज्ञान तो बहुत है, फिर भी आलस्य नहीं जाता। क्यों?
महाराज जी कहते हैं कि तूणीर बँधा है, धनुष भी हाथ में है, पर निशाना लगाना कभी आया नहीं — तो फ़ायदा क्या? ज्ञान तभी काम का है जब आचरण में उतरे। वह बल नाम जप, सात्विक भोजन और सत्संग से आता है, जिससे धीरे-धीरे पकड़ में आने लगता है कि गलती कहाँ हो रही है।
कभी बहुत उत्साह रहता है, कभी कुछ नहीं होता। क्या यह सामान्य है?
हाँ। महाराज जी समझाते हैं कि सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का चक्र सबमें चलता है। तमोगुण आए तो निद्रा और आलस्य आते हैं; सतोगुण आए तो अच्छे काम अपने आप अच्छे लगते हैं। धीरज मत छोड़िए, गलत रास्ते पर मत जाइए — अभ्यास करते रहिए, यह समय भी बीत जाएगा।
कहीं मेरी थकान किसी बीमारी की वजह से तो नहीं?
हो सकता है। जब एक साधिका ने थायराइड के साथ भारी आलस्य की बात कही, तो महाराज जी ने पहले उस रोग की औषधि लेने को कहा। अगर हर समय थकान रहती है, तो साधना के साथ डॉक्टर को भी दिखाइए — और चल रहा इलाज कभी बंद मत कीजिए।
आपके मन में भी कोई प्रश्न है?
सारथी से हिंदी, English या Hinglish में पूछिए — सत्संग पर आधारित उत्तर, स्रोत के साथ।
यह लेख ऊपर दिए गए सत्संग स्रोतों के आधार पर AI (Claude) की सहायता से लिखा गया है। स्रोत स्वतः-लिखित (auto-transcribed) हैं — सटीक शब्दों के लिए मूल वीडियो सुनें। सारथी एक स्वतंत्र प्रोजेक्ट है; यह पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज, उनके आश्रम या भजन मार्ग चैनल से संबद्ध या उनके द्वारा अनुमोदित नहीं है। यह चिकित्सा, कानूनी या मानसिक-स्वास्थ्य सलाह का विकल्प नहीं है।
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